3.8 C
New York
Thursday, February 9, 2023

Buy now

spot_img

Mulayam Singh Yadav Death Political Career From Beginning To End


Mulayam Singh Yadav Death: 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के टिकट पर विधायक बनने के बाद मुलायम सिंह यादव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. हालांकि, अपने शुरुआती दिनों में लोहिया के अन्य कट्टर अनुयायियों के बीच मुलायम पर किसी का ध्यान नहीं गया. लो-प्रोफाइल मुलायम भाषण देने में कुछ खास नहीं थे और वे लोहिया, चरण सिंह, राम सेवक यादव और अन्य लोगों के बीच खड़े होने के लिए संघर्ष करते रहे.

अक्टूबर 1967 में केवल 57 साल की आयु में लोहिया की मृत्यु के बाद, उनके अधिकांश समर्थकों और समर्थन आधार ने किसान नेता चौधरी चरण सिंह, जो एक जाट थे, उनके प्रति अपनी वफादारी की घोषणा की. 4 अप्रैल 1967 को चरण सिंह यूपी के सीएम बने, हालांकि वे एक साल से भी कम समय के लिए इस पद पर रहे.

1967 के चुनावों में अपनी सीट जीतने वाले मुलायम 1969 के मध्यावधि चुनाव में एसएसपी उम्मीदवार के रूप में हार गए. 1970 में चरण सिंह (Charan Singh) फिर से मुख्यमंत्री बने और इस बार इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस गुट ने उनका समर्थन किया. यह सरकार 225 दिन चली. 1974 के चुनावों से पहले मुलायम, चरण सिंह की पार्टी में शामिल हो गए और उनके करीब हो गए. आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी का गठन किया गया था तो चरण सिंह के साथ उनके खेमे के एक प्रमुख नेता मुलायम भी थे.

चरण सिंह ने दिया मुलायम को बड़ा झटका

1977 के चुनावों में जनता पार्टी ने जीत हासिल की और केंद्र में सरकार बनाई. चरण सिंह, जो प्रधानमंत्री बनने के अपने अवसरों की कल्पना करते थे, केंद्र में चले गए. इस दौरान मुलायम को बड़ा झटका लगा, क्योंकि उन्होंने अपने अन्य शिष्य राम नरेश यादव (उस समय आजमगढ़ के एक सांसद) को यूपी की राजनीति के लिए अपने प्रतिस्थापन के रूप में चुना.

मुलायम ने सहकारिता, पशुपालन और ग्रामीण उद्योग मंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन यूपी में जनता पार्टी की दो सरकारें (राम नरेश यादव और फिर बनारसी दास की) कुल मिलाकर तीन साल चलीं और 1980 के चुनावों में इंदिरा गांधी वापस सत्ता में लौट आईं. इस वक्त भी मुलायम चुनाव हार गए थे. चरण सिंह ने जनता दल पार्टी के अपने गुट का नाम बदलकर लोकदल कर दिया और मुलायम ने लोकदल (Lokdal) एमएलसी के रूप में सदन में जगह बनाई.

मुलायम ने ‘फर्जी मुठभेड़ों’ में मारे गए लोगों का उठाया मुद्दा

जून 1980 और जुलाई 1982 के बीच यूपी के सीएम कांग्रेस नेता वीपी सिंह थे, जो एक शाही विरासत वाले राजपूत थे. मुलायम ने इस दौरान ज्यादातर गैर-उच्च जाति समुदायों के डकैतों की मुठभेड़ में हत्याओं की शुरुआत देखी. विधान परिषद में लोकदल के विपक्ष के नेता, मुलायम ने राज्य भर में “फर्जी मुठभेड़ों” में कथित तौर पर मारे गए 418 लोगों की एक लिस्ट तैयार की और इसे मीडिया व जनता में उठाया. उस समय के तीन सबसे प्रमुख गिरोहों का नेतृत्व क्रमशः एक ठाकुर, एक मल्लाह और एक यादव कर रहे थे, लेकिन सरकार द्वारा वंचित समुदायों को निशाना बनाने के मुलायम के बयान को जोर मिला. वीपी सिंह का यह आरोप कि कुछ राजनेता चुनावों में अपनी ही जातियों के डकैतों से मदद लेते हैं, टिक नहीं पाया और उनकी सरकार को अंततः मुलायम द्वारा उजागर किए गए कई मुठभेड़ों की जांच का आदेश देने के लिए मजबूर होना पड़ा.

वीपी सिंह ने बाद में खुद को पिछड़े वर्गों के मसीहा के रूप में फिर से कास्ट किया. तब उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री के रूप में वे केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी को 27% आरक्षण देने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करेंगे और साथ ही साथ भीम राव अम्बेडकर को भारत रत्न से सम्मानित करेंगे. यूपी में वीपी सिंह सरकार पर दबाव बनाने के बावजूद, मुलायम ने अब एक आयोजक और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में अपनी असली ताकत दिखाई, जो सभी जातियों और समुदायों के लोगों के साथ दोस्ती कर सकता था. जबकि कई लोगों ने उनकी आलोचना की.

‘नाम मुलायम सिंह, लेकिन काम बड़ा फौलादी’

1987 में चरण सिंह के निधन के बाद मुलायम लोकदल के भीतर सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे. उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ और बीजेपी के राम मंदिर आंदोलन के खिलाफ राज्य भर में एक अभियान शुरू किया. 1988 में उनकी क्रांति रथ यात्रा पर कई जगहों पर हमले हुए. जैसा कि वी.पी सिंह अब राष्ट्रीय राजनीति में राजीव गांधी के लिए मुख्य चुनौती के रूप में उभर रहे थे तो मुलायम ने लोक दल का पार्टी में विलय कर दिया. चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह ने चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे. 1989 के चुनावों में जनता दल का लोकप्रिय नारा था “नाम मुलायम सिंह है, लेकिन काम बड़ा फौलादी है (उनके नाम का अर्थ नरम है, लेकिन उनके कर्म लोहे के पहने हुए हैं).”

1992 में की समाजवादी पार्टी की स्थापना

अक्टूबर 1990 में बीजेपी ने केंद्र में वीपी सिंह सरकार के साथ-साथ यूपी में जनता दल सरकार से समर्थन वापस ले लिया. मुलायम ने चंद्रशेखर की ओर रुख किया और कांग्रेस के समर्थन से उनकी सरकार बचाई. अक्टूबर 1992 में उन्होंने अपनी समाजवादी पार्टी बनाई. इस समय तक बीजेपी ने कमंडल (मंदिर) और मंडल (जाति) दोनों की राजनीति करना सीख लिया था और लोध समुदाय के कल्याण सिंह और कुर्मी विनय कटियार जैसे नेताओं को सामने रखा.

आखिरकार कांग्रेस के भाग्य ने राम मंदिर आंदोलन के खिलाफ मुलायम के कड़े रुख को तय कर दिया. यहां तक ​​कि जब राजीव गांधी सरकार ने इस मुद्दे पर टालमटोल किया तो मुलायम सरकार ने विहिप और बीजेपी जैसे संगठनों के आह्वान पर अयोध्या में कारसेवकों के एक समूह को रोकने के लिए उन पर गोलियां चला दीं. मुस्लिम वोटों ने कांग्रेस को एसपी के लिए भारी मात्रा में छोड़ दिया और मुलायम की पार्टी में यह विश्वास आज तक कायम है.

‘मिले मुलायम, कांशी राम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’

कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बसपा के आगे बढ़ने के साथ 1993 में मुलायम आगामी विधानसभा चुनावों के लिए बसपा के साथ गठबंधन करने में कामयाब रहे. यूपी की राजनीति के सभी स्थापित राजनीतिक समीकरणों को फिर से बदल दिया गया. इस गठबंधन ने बीजेपी को सत्ता में आने से सफलतापूर्वक रोक दिया और एक नया नारा पैदा हुआ: “मिले मुलायम, कांशी राम, हवा में उड़ गए जय श्री राम.”

गेस्ट हाउस कांड ने बदल दिए समीकरण

हालांकि, इसबहुप्रतीक्षित गठबंधन का तीखा अंत हुआ जब बसपा ने कुख्यात गेस्ट हाउस की घटना के बाद अपना समर्थन वापस ले लिया. जून 1995 में, बसपा ने बड़ा सियासी दांव चला और बीजेपी के समर्थन से सत्ता में वापसी की और मायावती उत्तर प्रदेश की पहली हलित सीएम बनीं. 1996 में, मुलायम का केंद्र में ट्रांसफर हो गया और वे एच डी देवेगौड़ा और फिर आई के गुजराल के नेतृत्व वाली अल्पकालिक संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री रहे. यह एकमात्र समय था जब मुलायम ने केंद्र में एक पद संभाला था.

सिमटती चली गई समाजवादी पार्टी, बीजेपी का हुआ उदय

बाद के वर्षों में बीजेपी ने ओबीसी राजनीति के लाभ पर कब्जा किया और सपा ने अपने समर्थन आधार का एक बड़ा हिस्सा खो दिया. जैसे-जैसे समाजवादी पार्टी यादवों से जुटी पार्टी में सिमटती चली गई, वैसे-वैसे ओबीसी बीजेपी के साथ साथ बसपा में शामिल हो गए. मुलायम ने अपने आधार को राजपूतों (ठाकुरों) तक विस्तारित करने की कोशिश की. उन्होंने निर्दलीय विधायक राजा भैया को शामिल किया और अमर सिंह को अपने सबसे करीबी सहयोगियों में से एक बना दिया.

2003 में आखिरी बार सीएम बने मुलायम सिंह यादव

2003 के मध्य में, बसपा-बीजेपी गठबंधन के टूटने के बाद मुलायम फिर से मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनावों में सपा ने 39 लोकसभा सीटें हासिल कीं. यह आखिरी बार था जब मुलायम सीएम बने. उस वक्त वे कथित आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई जांच का भी सामना क रहे थे. जब सपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तब 72 वर्षीय मुलायम ने अखिलेश को कमान सौंपी, जिन्होंने मार्च 2012 में सीएम के रूप में शपथ ली थी.

ये भी पढ़ें- Mulayam Singh Death: तीन महीने पहले जिस अस्पताल में हुआ था पत्नी का निधन, नेता जी ने वहीं ली अंतिम सांस

ये भी पढ़ें- Mulayam Singh Yadav Died: अखाड़े में मशहूर था मुलायम सिंह यादव का चरखा दांव, गुप्‍त मतदान से बने CM, पढ़ें नेताजी से जुड़े रोचक किस्‍से



Source link

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
3,706FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles